मिसाल सूखा पढ़ाई न छुड़वा दे, इसलिए स्टूडेंट ग्रुप ने 600 छात्रों के लिए की खाने की व्यवस्था, फीस भी जुटाई

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मिसाल सूखा पढ़ाई न छुड़वा दे, इसलिए स्टूडेंट ग्रुप ने 600 छात्रों के लिए की खाने की व्यवस्था, फीस भी जुटाई

2015 में किया था 1800 छात्रों के लिए मुफ्त भोजन का इंतजाम
पुणे . देश का सबसे सूखाग्रस्त क्षेत्र महाराष्ट्र का मराठवाड़ा। राणमला गांव के दीपक कणगे के पिता ने 2015 में खेती के कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। दीपक के सामने चुनौती थी लोकसेवा आयोग की परीक्षा के लिए पुणे में रहकर तैयारी करने की। उन्होंने नौकरी शुरू की। पर भोजन के लिए पैसे जुटाना भी मुश्किल था। ऐसे में मदद  के लिए आगे आया ‘स्टूडेंट हेल्पिंग हैंड’।

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ऐसी ही कहानी औरंगाबाद जिले के सोयगांव के विशाल दाभाड़े की है। दीपक और फर्ग्युसन कॉलेज में बीएससी के छात्र विशाल के साथ-साथ महाराष्ट्र की सौ से ज्यादा सूखाग्रस्त तहसीलों से पुणे आए छात्रों के लिए स्टूडेंट हेल्पिंग हैंड सबसे बड़ा मददगार बन गया है। राज्य में यह अपनी तरह की पहली कोशिश है। फिलहाल 600 छात्रों को मुफ्त भोजन दिया जा रहा है। 400 और नाम जुड़ेंगे। शुरुआत 2015 में हुई थी, तब 1800 छात्रों के लिए मुफ्त भोजन का इंतजाम किया था। संगठन का हेल्पलाइन नंबर भी चलता है, जिससे हॉस्टल, कॉलेज में प्रवेश और करिअर में मदद की जाती है।

60 लड़कियों समेत 400 स्टूडेंट्स के बैंक खाते में हर माह 2,200 रु.
स्टूडेंट हेल्पिंग हैंड के संस्थापक कुलदीप आंबेकर बताते हैं कि जरूरतमंद छात्रों को दोनाें वक्त टिफिन दिया जाता है। दो हजार लोगों ने आवेदन किया था। 600 लोगों के मैस की व्यवस्था हो पाई है। 200 स्टूडेंट्स को घरों पर टिफिन पहुंचाए जाते हैं। 400 स्टूडेंट्स के बैंक खाते में हर महीने 2,200 रुपए भोजन के लिए जमा करवाए जाते हैं।

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1800 छात्रों को एकजुट कर फीस भी माफ करवाई थी… 
बात 2014 की है। उस्मानाबाद जिले से कुलदीप एमएससी केमिस्ट्री पढ़ने पुणे पहुंचे थे। पिता ने साहूकार से 40 हजार रुपए कर्ज लेकर फीस जुटाई थी। कुलदीप ने सूखाग्रस्त क्षेत्रों के 1,800 छात्राें को संगठित कर फीस माफी के लिए संघर्ष किया और सफलता भी पाई। इस दौरान उन्हें समझ आया कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों से आए छात्रों के लिए दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल है। उन्होंने उद्योगपतियों व सामाजिक संस्थाओं से संपर्क साधा। इस तरह शुरुआत हुई स्टूडेंट हेल्पिंग हैंड की, जिसका रजिस्ट्रेशन 2018 में हुआ।

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