एक और तबादले पर फूटा IAS अशोक खेमका का दर्द, बोले- लगता है, हार गया हूं

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एक और तबादले पर फूटा IAS अशोक खेमका का दर्द, बोले- लगता है, हार गया हूं

आइएएस अफसर डॉ. अशाेक खेमका का दर्द एक और तबादले के बाद फूट पड़ा है। अपने 52वें तबादले के बाद खेमका ने कहा अहसास होता है कि हार गया हूं। फिर लगता है स्‍वयं से ही हार सकता हूं।

चंडीगढ़ हरियाणा के वरिष्‍ठ आइएएस अफसर डॉ. अशोक खेमका का एक और तबदला हो गया है और यह अब हैरान नहीं करती, न लोगों को और न ही खुद खेमका को। उनका अपनी 28 साल की नौकरी में 52 बार तबादला हो चुका है। इस पर खेमका का दर्द यूं बाहर आया है, ‘ हर तबादले के बाद कुछ खोने जैसा अहसास होता है…लगता है, हार गया हूं…लेकिन फिर लगता है कि मैं सिर्फ स्वयं से हार सकता हूं। शुरू में बुरा लगता है, लेकिन फिर जिंदगी अपनी रफ्तार पर लौट आती है।’

पांच-पांच मुख्यमंत्रियों से भिड़ चुके खेमका, अब तो पत्नी और बच्चे भी नहीं होते तबादलों पर परेशान

सीनियर आइएएस अधिकारी डॉ. अशोक खेमका अपने हर तबादले पर दुखी हुए और इसे कई बार जाहिर भी किया, लेकिन इस बार कैबिनेट मंत्री अनिल विज के विभाग से रुखसत किया जाना उनका ज्‍याद चोट दे गया। 1991 बैच के आइएएस खेमका को अब तबादलों की आदत सी हो गई है। उनकी पत्नी और बच्चे भी तबादलों की खबर पर हैरान-परेशान नहीं होते।

बंसीलाल से लेकर लेकर मनोहर लाल तक, कोई ऐसी सरकार नहीं बची, जिसमें खेमका का व्यवस्था से सीधे टकराव नहीं हुआ। भजनलाल, ओमप्रकाश चौटाला हों या फिर भूपेंद्र सिंह हुड्डा, हर राज में खेमका सीधे व्यवस्था से टकराते रहे। बदले में उन्हें धड़ाधड़ तबादलों का इनाम मिले।

राज्यमंत्री कृष्ण कुमार बेदी के नेतृत्व वाले समाज कल्याण विभाग से जब खेमका का 51वां तबादला हुआ था और उन्हें खेल मंत्री अनिल विज के विभाग में प्रधान सचिव बनाकर भेजा गया था। उस समय अनिल विज ने मीडिया में बयान दिया था कि अब मजा आएगा… जब मिलकर बैठेंगे दो यार। विज और खेमका दोनों की छवि ईमानदार अफसर और ईमानदार मंत्री की है, लेकिन विज भी खेमका को अपने खेल विभाग में नहीं रोक सके।

बताया जाता है कि डॉ. अशोक खेमका को मनोहरलाल सरकार के उस फैसले के विरोध की सजा मिली है, जिसमें फरीदाबाद के कोट गांव की अरावली के दायरे में आने वाली जमीन की चकबंदी कराने को मंजूरी दी गई है। वर्ष 2012 में खेमका जब चकबंदी महानिदेशक थे, तब उन्होंने चकबंदी पर रोक लगा दी थी।

अब सवाल उठता है कि आखिर खेमका ही क्यों निशाने पर होते हैं? इसका जवाब यह भी हो सकता है कि हर किसी को संदेह की निगाह से देखना और गलत को गलत कहने की खेमका की आदत, तबादलों की बड़ी वजह है, जो किसी सरकार को रास नहीं आती।

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दरअसल, कोई भी राजनीतिक दल जब विपक्ष में होता है, तब खेमका के फैसले उसे खासे पसंद आते हैं। सत्ता में आते ही खेमका का यह विरोध इन राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। राबर्ट वाड्रा-डीएलएफ डील का इंतकाल रद करने वाले खेमका के फैसले का पुरजोर समर्थन करने वाली भाजपा के कार्यकाल में भी खेमका का तीन मंत्रियों और मुख्यमंत्री मनोहर लाल से सीधा टकराव हो चुका है। मुख्य सचिव ने खेमका की एसीआर में 10 में से 8.22 नंबर दिए। खेल मंत्री अनिल विज ने इन्हें बढ़ाकर 9.92 कर दिया, मगर मुख्यमंत्री ने नौ नंबर दिए। इसके खिलाफ खेमका हाईकोर्ट पहुंच गए और अब यह केस हाई कोर्ट में चल रहा है।

हमेशा ठीक नहीं होते खेमका मगर झुकने की आदत नहीं

ऐसा भी नहीं है कि अशोक खेमका हमेशा ठीक होते हैं और सरकार हमेशा गलत। कई बार अधिकारी को व्यवस्था के हिसाब से खुद को एडजस्ट करना पड़ता है, मगर खेमका शायद ऐसा नहीं कर पाते। यही वजह है कि उनका हर सरकार में टकराव रहता है।

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भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध के लिए मिला पुरस्कार

‘भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध’ के लिए अशोक खेमका को वर्ष 2011 एसआर जिंदल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को उजागर करने में उनके निडर प्रयासों के लिए आइएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के साथ 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार मिला है।

रिटायरमेंट के बाद वकालत करेंगे खेमका

53 वर्ष के हो चुके अशोक खेमका पश्चिम बंगाल के कोलकाता के रहने वाले हैं। उन्होंने वर्ष 1988 में आइआइटी खडग़पुर से स्नातक और टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान मुंबई से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी और एमबीए किया हुआ है। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से कानून की भी पढ़ाई की है। रिटायरमेंट के बाद उनका वकालत करने का इरादा है।

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