16 काल कोठरियों वाली जेल, यहां से कभी कोई कैदी भाग नहीं सका

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सोलन (हिमाचल)। आज़ादी की 72वीं सालगिरह की सुंदर सुबह। इसे सेलिब्रेट करने से पहले अंग्रेजों 1849 में अग्रेंजों की बनाई मैक्सिमम सिक्योरिटी मिलिट्री जेल में कुछ वक्त गुजारा। जेल डगशाई में कुछ देर रहकर हमने महसूस किया कि गुलामी और बेबसी का दौर कितना मुश्किल रहा होगा। उस दौर में 72,873 रुपए में बनी इस 54 सेल वाली जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को 8×12 या 2×2 की हवालात में रखकर टॉर्चर किया जाता था। यह जेल ईस्ट इंडिया द्वारा बनाई गई पहली दो जेलों में से एक है। जिसके बारे में बहुत लोग अब भी जानते नहीं हैं। यहां जो कैदी आए अंधेरा उनकी नियति बना। इसी घुटन में उन्होंने फांसी का इंतजार किया। इन्हीं लोहे के भारी दरवाज़ों से उन्हें भीतर धकेल दिया गया था, किसी जानवर या बेजान सामान की तरह।

यहां 2 मिनट से ज्यादा रहने पर घुटने लगता है दम…

जेल के कालकोठरी जैसे अंधेरे में तमाम क्रांतिकारियों ने वर्षों गुजार दिए। इस जेल में आम आदमी 2 मिनट से ज्यादा वक्त गुजार नहीं पाता, दम घुटने लगता है। साढ़े 5 हजार फीट की ऊंचाई पर बनी ये जेल अंडमान निकोबार की सेलुलर जेल से ज्यादा यातना देने वाली मानी जाती थी। इसका एक हिस्सा अब म्यूजियम बना दिया गया है। यहां गुलामी से लेकर आजादी तक की कई कहानियों को तस्वीर में फ्रेम कराकर लगाया गया है।

16 कालकोठरियों वाली यह जेल, यहां से कभी कोई कैदी भाग नहीं सका…

– साढ़े 5 हज़ार फुट ऊपर पहाड़ पर बनी बनी इस जेल को कभी तोड़ा नहीं जा सका।

– हिंदुस्तानी और आयरिश स्वतंत्रता संग्राम के कैदियों को मिलिट्री जेल में रखा गया।

– 1857 में विद्रोह करने वाले सैनिकों को यहां कैद किया।

– गदर पार्टी के 6 लीडरों को यहां फांसी दी।

– 1842 में यहां कैंटोनमेंट बनाया गया।

– 1949 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने डगशाई जेल बनाई। लागत थी 72873 रुपए ।

– 8’x12’ की 54 सेल बनाई गईं । इनमें 16 कालकोठरियां बनाई गईं। जिनमें न रोशनी जाती थी, न ही ताजी हवा। सिर्फ एक रोशनदान, जो दिन में रोशनी देता। कभी यहां से कोई कैदी भाग नहीं सका।

– सेल के भीतर झांकने के लिए एक जालीदार छेद था जिसमें से संतरी बात करता था।

– वेंटीलेशन के लिए महज एक रोशनदान था जिसे अंग्रेज मर्जी से खोलते-बंद करते थे।