6 साल में 300 किसानों को जोड़कर बना डाली खुद की कंपनी

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गांव की तरक्की से ही होगा देश का विकास…इस सोच के बाद विदेश में 37 लाख का पैकेज वाली जॉब छोड़ गांव आ गया यह शख्स

जशपुर (छत्तीसगढ़)। समर्थ जैन नैनो साइंटिस्ट बने और बेल्जियम में उन्हें एक कंपनी में 37 लाख रुपए सालाना पैकेज की नौकरी मिल गई। बेल्जियम में जब समर्थ ने देखा कि वहां वैज्ञानिक जैविक खेती पर रिसर्च कर रहे हैं और वहां खेती में रसायनों का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है, तो समर्थ से रहा नहीं गया। समर्थ जैन नौकरी छोड़कर सीधे अपने गांव गम्हरिया लौट आए और यहां आकर उन्होंने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए काम शुरू कर दिया। दिसंबर 2013 में समर्थ ने वैदिक वाटिका नाम से अपनी कंपनी बनाई और क्षेत्र में किसान जैविक खेती से जुड़ें इसके लिए काम शुरू किया। उनके इस अभियान में अब तक 300 किसान जुड़ चुके हैं।

तैयार किए विभिन्न प्रोजक्ट:- शुरुआती सीजन में जब उन्होंने जब खेती करनी शुरू की तो पाया कि पूरा मार्केट रासायनिक खाद व गुणवत्ताहीन बीज से भरा है। इससे किसानों को नुकसान हो रहा था। इससे रोकने के लिए समर्थ ने अपने घर की प्रयोगशाला में जैविक कीटनाशक, फफूंदनाशक आदि प्रॉडक्ट तैयार किए। साथ ही रासायनिक खाद की जगह इन्होंने कंपोस्ट सिस्टम में जैविक खाद भी तैयार किया। इसका खेतों पर बेहतर परिणाम भी देखने को मिला।

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किसानों को सहयोग कर साइंटिस्ट समर्थ क्षेत्र में जैविक खेती तो इंजीनियर प्रशांत गोसेवा को क्षेत्र में दे रहे बढ़ावा

हाल ही में समर्थ ने अपनी जैविक कंपनी को रजिस्टर्ड करवा ली है। अब जैविक प्रॉडक्ट मार्केट में कम दामों में बेच रहे हैं, जिससे किसानों के खेत की उपजाऊ क्षमता नष्ट हुए बिना बेहतर उत्पादन हो रहा है। समर्थ ने एग्रीकल्चर के साथ-साथ अब पशुपालन के क्षेत्र में भी काम शुरू किया है। उन्होंने डेयरी की स्थापना की है। समर्थ ने बताया कि 2012 में जब उन्होंने बेल्जियम में कंपनी ज्वाइन की तो पाया कि वहां खेतों में रासायनिक चीजों का उपयोग पूरी तरह से बंदकर जैविक खेती को बढ़ावा दिया। इधर हमारे भारत देश से लगातार किसानों की आत्महत्या व उनकी दुर्दशा की खबरें वहां भी सुनने को मिलती थी। भारतीय किसानों की दुर्दशा का वहां उदाहरण दिया जाता था, जिसके कारण उन्होंने वहां की नौकरी छोड़ी और अपने देश लौटकर जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम करने की मन में ठान ली।

दूसरा उदाहरण : बड़ोदरा में इंजीनियरिंग कर रहे प्रशांत लौटे गांव

प्रशांत शर्मा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग का काेर्स किया। प्रशांत को बड़ोदरा में एक कंपनी में नौकरी मिल गई थी। वहां रहते हुए जब उन्होंने डेयरी फर्म से किसानों के जीवन में खुशहाली देखी तो उन्हें अपने गांव की याद आ गई। वहां की नौकरी छोड़ प्रशांत अपने गांव तपकरा लौट आए और यहां आकर उन्होंने अपने घर के पास ही डेयरी फर्म खोल लिया।

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मैकेनिकल इंजीनियर प्रशांत 350 किसानों के साथ मिलकर गांव में अब गौशाला चला रहे

नवंबर 2017 में प्रशांत ने अपने गांव में डेयरी फर्म खोला और यहां गुजरात से लाकर देसी उन्नत नस्ल की गायों को पाला। गायों को चारा खिलाने से लेकर दूध निकालने तक का काम प्रशांत खुद करते हैं। प्रशांत ने अपने आसपास के अन्य पशुपालक ग्रामीणों से मिलकर देसी नस्ल की गायों के संवर्धन और संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए उन्हें प्रेरित किया। नतीजा अब तपकरा के निकट ग्राम बोखी में 350 पशुपालक किसानोें द्वारा एक गौशाला की स्थापना की है। यहां देसी नस्ल की गायों से अधिक दूध उत्पादन के लिए काम किया जा रहा है। गौशाला के जुड़े किसान गाय के दूध, दही व घी की मार्केटिंग भी कर रहे हैं। प्रशांत ने तपोस्थली फाउंडेशन नामक एक कंपनी बनाई है। प्रशांत ने बताया कि गाय के गोबर, गौमूत्र व दूध का सही उपयोग हो और उससे पशुपालकों का जीवन स्तर सुधरे इसलिए इस दिशा में काम किया जा रहा है।

गाय के गोबर, मूत्र व दूध से बने अपने प्रॉडक्ट उतारेंगे बाजार में

प्रशांत ने बताया कि हमारी आगे की प्लानिंग गायों के गोबर, मूत्र व दूध से कई प्रॉडक्ट तैयार करने का है। इसके लिए काम शुरू कर दिया गया है। जल्द ही तपोस्थली फाउंडेशन के जरिए गौ अर्क, गौमूत्र से मेडिसिन, गोबर से कंपोस्ट खाद, नेचुरल कीटनाशक, धूप बत्ती, अगरबत्ती आगे बनाया जाएगा। इन प्रॉडक्ट्स की सेलिंग से सभी पशुपालकों को लाभ होगा। साथ ही गौ वंश की देसी नस्लों का संरक्षण भी हो सकेगा। प्रशांत ने बताया कि शहर में रहकर नौकरी करते हुए उन्हें जो मासिक वेतन मिलता था उतना वे गांव में रहकर भी कमा ले रहे हैं। फाउंडेशन का काम आगे बढ़ेगा तो वेतन से कई गुना ज्यादा मुनाफा होगा। साथ ही गांव के अन्य हजारों लोगों को भी मुनाफा होगा।

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