10-10 साल के बच्चों से ‘लौंडा नाच’ कराते, उनका रेप करते हैं

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2009 में एक डॉक्यूमेंट्री आई. नाम था ‘द डांसिंग बॉयज ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान’. यानी अफ़ग़ानिस्तान के नाचने वाले लड़के. आपको लग सकता है कि जहां लड़कों को नाचने-गाने की छूट हो, वो तो एक अच्छा देश होगा. मगर इस टाइटल के पीछे एक दर्दनाक कहानी है, एक बुरी सच्चाई है. सच्चाई ये है कि यहां की अत्यंत धार्मिक सरकार पीडोफाइल, यानी बच्चों के साथ जबरन सेक्स करने वालों को पनाह देती है. ये बच्चे वो हैं, जिन्हें हमारे यहां ‘लौंडे’ कहते हैं. जो लड़कियों की तरह कपड़े पहनकर नाचते हैं. ये उम्र से अक्सर नाबालिग होते हैं.

वहां की एक मशहूर कहावत है, बच्चे पैदा करने हों तो औरत, मज़ा चाहिए हो तो मर्द.

अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा देश है, जहां समलैंगिकता को गैर-इस्लामिक और अनैतिक कहकर बार-बार गुनाह बताया गया है. अफ़ग़ानिस्तान में इस बारे में बात तक नहीं होती. मीडिया इसे कवर नहीं करता. मगर इसी देश में लड़कों के साथ नाच के नाम पर रेप किया जाता है. इससे हमें मालूम पड़ता है कि जिस नैतिकता और इस्लाम का ये हवाला देते हैं वो कितना दोगला है.

अफ़ग़ानिस्तान में इस प्रथा को बच्चाबाज़ी कहते हैं. बड़ी-बड़ी पार्टियों में, जो अमीर पुरुष देते हैं, में इन बच्चों को बुलाया जाता है. बच्चों की उम्र 10 साल जितनी कम भी हो सकती है. इन बच्चों को अश्लील गानों पर नचाते हैं. ऐसे गाने जिनमें ‘ऐ लड़के, तुमने मेरे बदन में आग लगा दी है’ जैसे बोल होते हैं. नाच ख़त्म होने के बाद बच्चों को खिलौनों की तरह इन पुरुषों के हवाले कर दिया जाता है ताकि वो उनका रेप कर सकें.

हालांकि लोग जब भी तालिबान का नाम लेते हैं, हमें मानवाधिकारों का हनन ही याद आता है. लेकिन बच्चाबाज़ी की प्रथा को रोकने की कोशिश सबसे पहले तालिबान ने ही की थी. तालिबान की ये हरकत लोगों को पसंद नहीं आई थी.

इन लड़कों को ‘बच्चा बेरीश’ कहते हैं. जिसका अर्थ होता है ‘लौंडा’. ये लौंडे एक मालिक के घर में रहते हैं. और उसकी पार्टियों में लोगों का मनोरंजन करते हैं. बदले में उन्हें रहने के लिए पनाह, कपड़े और खाना मिल जाता है. इन बच्चों को बच्चाबाज़ी के कुएं में धकेलने वाली सबसे बड़ी वजह है गरीबी. जिसके पास खाने को नहीं है, उसे जिंदा रहने का बस एक ही तरीका दिखाई पड़ता है. एक बेहतर जीवन की तलाश में लड़के इस तरफ आकर्षित हो जाते हैं. इसके अलावा कई बार बच्चों को किडनैप कर बेचा भी जाता है.

तालिबान के राज में इस प्रथा का लगभग सफाया हो गया था. इसके लिए लोगों ने तालिबान से ख़ूब नफरत की. मगर जैसे ही तालिबान की जगह सिविल गवर्नमेंट वापस आई, देश के अमीरजादों ने अपना प्रिय काम फिर से करना शुरू कर दिया. ये प्रथा ख़त्म इसलिए भी नहीं हो पाती है क्योंकि ये शौक अमीरों का है. जो आदमी किसी लौंडे को अपने घर में पालने में समर्थ होता है, वो अमीर होता है. पैसों से उनकी इज़्ज़त बनती है. अगर कोई व्यक्ति एक से ज्यादा लौंडों को पाल पा रहा है, तो ये और भी बड़ी बात होती है. क्योंकि लौंडों की सभी जरूरतों को मालिक ही पूरा करता है.

ये युवा लड़के अक्सर अपने साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव के ट्रॉमा से निपटने के लिए नशे का सहारा लेते हैं. चूंकि ये अब परिवार के साथ नहीं रहते, न ही इनकी कोई इज़्ज़त रह जाती है, इसलिए इनको होने वाला दर्द शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होता है. नतीजा, ड्रग्स. अगर ये किसी तरह मालिक के चंगुल से बच भी निकलें, तो इन्हें कोई रोजगार देने को तैयार नहीं होता. या तो ये फिर से नाच के काम में वापस आ जाते हैं, या दूसरे बच्चों का सौदा करने वाले दलाल बन जाते हैं.

सबसे बुरी बात ये है कि ये पीडोफीलिया जैसे गुनाह को आम बना देता है. जब उनसे पूछो कि आप तो समलैंगिकता को गलत मानते हैं, वो कहते हैं कि ये समलैंगिकता तो है ही नहीं. समलैंगिकता में तो प्रेम होता है, दोनों पार्टनर्स की सहमति होती है. ये तो बस मज़े के लिए किया गया एक काम है. ये तो मालिक और नौकर के बीच का एक रिश्ता है.

संयुक्त राष्ट्र में विवादित क्षेत्रों के बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था देखने वाली राधिका कुमारस्वामी ने एक इंटरव्यू में ‘फ्रंटलाइन’ को बताया:

जब भी अफगानियों के सामने, यहां तक कि उनके बड़े अधिकारियों के सामने इस बात का जिक्र किया है, वो हमेशा ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं जैसे उनके ऊपर कोई बम गिरा दिया गया हो. ये विषय बात करने के लिए नहीं है. बल्कि एक व्यक्ति ने तो मुझसे कह भी दिया था, ‘ऐसे विषयों पर हम बात नहीं करते. पहले युद्ध ख़त्म करना है. फिर दूसरी चीजों के बारे में सोचेंगे.’ एक मीटिंग में जिक्र कर दिया तो पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. मैंने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका जिक्र किया, तो पत्रकार झेंप कर हंसने लगे जैसे ये बात करने का टॉपिक है ही नहीं.

इस प्रथा के बारे में काफी लिखा गया, डॉक्यूमेंट्री बनाई गई. लेकिन ये रुकने का नाम नहीं लेती. इतना ट्रॉमा, इतना दर्द, इतनी हिंसा, इतनी बेइज़्ज़ती, सब चुपचाप सहते हैं ये बच्चे. नेताओं और धर्मगुरुओं ने कई बार इसे ख़त्म करने की कोशिश की, लेकिन कुछ हुआ नहीं. सिर्फ इन अमीरज़ादों को रोकना ही जरूरी नहीं, उन लड़कों को रोजगार दिलाना भी जरूरी है जो अपने ट्रॉमा के बाद दलाल बन दूसरे लड़कों को इसमें खींचने की कोशिश करते हैं.