14 माह की बेटी की चीख, भागकर पहुंची तो नहीं थे उसके शरीर पर कपड़े

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14 month old girl trying to molestation in shringganagar rajasthan,Rajasthan, Ganganagar

श्रीगंगानगर मैं मांगीलाल स्वामी, फोटोजर्नलिस्ट राकेश वर्मा के साथ बुधवार को स्थित उस घर में पहुंचा, जहां मंगलवार को 14 माह की एक मासूम के साथ ज्यादती की कोशिश की गई थी। जैसे ही मैं मकान की सीढ़ियों के सामने रुका तो एकाएक अनेक निगाहें मुझ पर ही आ टिकीं। कोई कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन सबकी नजरें सवाल पूछ रहीं थी। दरवाजे की घंटी बजाई तो कुछ देर बाद एक महिला ने डरते-डरते थोड़ा सा गेट खोला और दबी आवाज में पूछा, कौन हो? मैंने अपना परिचय दिया तो बोली, आप मेरे पति से बात कर लीजिए। पीछे ही पति सीढ़ियां उतरते हुए मेरे पास आ पहुंचे। परिचय व आने की वजह जानने के बाद दोनों ने हमें घर में आने दिया। घर में 14 माह की बच्ची खेल रही थी। वही बच्ची, जिसके साथ मंगलवार को उसी के घर में ज्यादती की कोशिश की गई थी।

हमारे हाथों में गुड़िया, टॉफी, गुब्बारे देख वह हमारी ओर आने को चल पड़ी। कुछ ही कदम चली होगी कि पिता ने उसे गोद में उठा लिया। बोले- हम तो बच्चे का इलाज करवाने आए थे। लेकिन यहां तो लोग इस मासूम को ही कचोटने को बैठे हैं? बातों के दौरान ही मासूम खिलखिलाकर मेरी तरफ लुढ़क गई। जैसे ही उसे मैंने गोद में उठाया तो लगा कैसे कोई इस मासूम के साथ ऐसी हरकत करने की सोच सकता है क्योंकि बच्चों में तो भगवान बसते हैं। फिर माता-पिता बोले- इस घटना के बाद अब हमारा दुनिया से ही भरोसा उठ गया है। अब जल्दी किसी पर यकीन नहीं होगा?

तस्वीर में गुड़िया भले ही प्रतीकात्मक है, लेकिन बिल्कुल ऐसी ही दिखती है मासूम…

भास्कर ये गुड़िया लेकर मासूम के घर पहुंचा था। जैसे ही मासूम ने गुड़िया देखी, खिलखिलाकर इसकी ओर दौड़ पड़ी। लेकिन कुछ कदम चलते ही पिता ने इसे गोद में उठा लिया। मां भी बुरी तरह डरी हुई थी। रिपोर्टर ने गुड़िया, टॉफी व गुब्बारे बच्ची को देने चाहे तो उन्होंने लेने से मना कर दिए। बोले- अब जल्दी से किसी पर यकीन नहीं होगा।

घटना सुनाते माता-पिता की आंखों में आंसू आ गए… मां बोली- कभी सपने में भी नहीं सोचा था उसकी नन्हीं बच्ची से ऐसा हो सकता है

”मैं खाना बनाने की तैयारी कर रही थी। सब्जी के बचे छिलकों को नीचे सड़क के दूसरी तरफ डस्टबिन में डालने को गई थी। तभी पीछे से आरोपी घर में आ गया। वह मेरी मासूम बेटी को गोद में उठाकर ऊपर छत पर ले गया। उसे लगा होगा कि घर पर कोई नहीं है, इसलिए वह मासूम बच्ची के कपड़े उतार रहा था। तभी मैं वापस आ गई तो देखा कि बच्ची घर में नहीं है। उसी दौरान बच्ची की आवाज छत पर से आई तो मैं घबराकर ऊपर को भागी। मैंने मासूम को आरोपी के चंगुल से छुड़वाया और वापस कपड़े पहनाए। मैं अकेली थी इसलिए आरोपी वहां से भाग निकला। मैंने अपने पति को जाकर पूरा घटनाक्रम बताया। मैं एक मां हूं और हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई हमारी मासूम के साथ ऐसी हरकत भी कर सकता है।”

पिता बोले- बाबूजी, अब तो बच्ची को किसी को गोद देने में भी डर लगता है

”14 माह पहले मेरी पत्नी को जुड़वां बच्चे पैदा हुए। एक बेटा और एक बेटी के रूप में। एक साथ भगवान ने हमारी झोली खुशियों से भर दी। कुछ माह बाद पता चला कि मेरा बेटा बैठ नहीं सकता, उसकी रीढ़ की हड्डी में दिक्कत है। पहले मैंने अपने गांव के आसपास के डॉक्टरों को दिखाया लेकिन आराम नहीं आया। फिर गंगानगर में इलाज कराने आ गया। बच्चे का इलाज लंबा चलना है, इसलिए मैं यहीं कमरा किराए पर लेकर रहने लग गया। यहीं पर ही खाने-पीने की चीजों की रेहड़ी लगाकर आजीविका चलाता हूं। दुकान पर काम में मदद को एक नौकर रखा था। उसकी साली की शादी थी। वह अपने परिचित को (आरोपी) को दुकान पर छोड़कर खुद छुट्टी पर चला गया। इस घटना के बाद तो अब बेटी को किसी को गोद में देने से भी डर लगने लगा है।”

जब कोई पल्सिव डिजीज का शिकार होता है, तब एकदम से हार्मोंस बदल जाते हैं

”जब कोई भी व्यक्ति पल्सिव डिजीज अर्थात उन्माद का शिकार होता है तब उसके शरीर में ऐसे हार्मोंस का स्तर बढ़ जाता है जो उसे हमलावर कर देता है। यह घटना ऐसे लोगों के साथ अधिक होती है जो मानसिक रूप से विकृत होते हैं। जहां तक छोटे बच्चों के साथ अप्रिय घटना की बात है तो बच्चे आसान शिकार होते हैं। वे विरोध नहीं करते और पुलिस को भी आरोपी के बारे में ठीक से बता नहीं पाते।” प्रेमप्रकाश अग्रवाल, मनोरोग विशेषज्ञ

पोर्न साइट, सोशल मीडिया, इंटरनेट और टीवी भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार

”ऐसी घटनाओं के लिए अकेले आरोपी दोषी नहीं है। उसे ऐसा करने को उकसाने में घर परिवार, सोशल मीडिया, टीवी और फिल्मों में खुलापन, इंटरनेट पर सभी की आसान पहुंच के कारण बच्चों की पहुंच उन चीजों तक हो गई है जो नहीं होनी चाहिए थी। इन्हीं सब कारणों से समाज में खुलापन आ रहा है जो कि ऐसी घटनाओं को बढ़ावा दे रहा है। बच्चों को नैतिक शिक्षा, उनका फ्रैंड सर्किल अच्छा हो तो ऐसी घटनाओं की आशंका कम होती है।” डॉ. सुनीला गुप्ता, वरिष्ठ समाजशास्त्री


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