कैसे 42 निर्दोषों को मार नहर में फेंका, पीड़ितों ने सुनाई थी कहानी

25
Hashimpura Massacre, 1987, details, Delhi HC, sentences, accused, life term

मेरठ के चर्चित हाशिमपुरा कांड में दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए पीएसी के 16 आरोपी पूर्व जवानों को दोषी करार दिया है और उन्हें उम्रकैद की सजा दी है. इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, आजाद भारत में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, न उसके बाद हुआ. 1987 में भारत के संसद से सिर्फ 80 किमी दूर मेरठ के हाशिमपुरा में पीएसी के जवानों ने 42 मुस्लिम नौजवानों को मार दिया था और उन्हें गंग नहर और हिंडन में फेंक दिया था. आपको बता दें कि हाईकोर्ट ने दोषियों पर 10 हजार का जुर्माना भी लगाया गया है. इससे पहले दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 2015 में पीएसी के 19 आरोपी जवानों को बरी कर दिया था. (फोटो- घटना के बाद जिंदा बचने वालों में शामिल मुजिबुर रहमान, इंडिया टुडे/ चंद्रदीप कुमार)

कैसे हुई घटना- 22 मई, 1987 को सेना ने जुमे की नमाज के बाद हाशिमपुरा और आसपास के मुहल्लों में तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी अभियान चलाया था. उन्होंने सभी मर्दों-बच्चों को मुहल्ले के बाहर मुख्य सड़क पर इकट्ठा करके वहां मौजूद प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबलरी (पीएसी) के जवानों के हवाले कर दिया. यूं तो आसपास के मुहल्लों से 644 मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उनमें हाशिमपुरा के 150 मुस्लिम नौजवान शामिल थे.

50 नौजवानों को पीएसी के ट्रक यूआरयू 1493 पर लाद दिया गया, जिस पर थ्री नॉट थ्री राइफलों से लैस पीएसी के 19 जवान थे. इन जवानों ने 22 मई की काली रात को नाजी जुल्म की भी हदें पार कर दीं. हाशिमपुरा के पांच नौजवानों को छोड़कर ज्‍यादातर नौजवानों के लिए अलविदा जुमे की नमाज आखिरी साबित हुई. मोहम्मद उस्मान, मोहम्मद नईम, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान और नासिर गोली मारे जाने और नहर में फेंके जाने के बावजूद जिंदा बच गए थे.

2012 में इंडिया टुडे को नासिर ने बताया था- ‘हमें मगरिब की नमाज (सूरज डूबने के बाद) के वक्त खुले ट्रक में इस तरह बैठाया कि बाहर से कोई नहीं कह सकता था कि उसमें कोई बैठा है. रात को बेगम ब्रिज, दिल्ली रोड से होते हुए मुरादनगर की गंग नहर पर ले गए. नौ बजे होंगे. ट्रक को नहर के किनारे लगाया और सारे पीएसी के जवान नीचे उतर आए. उन्होंने पिछला हिस्सा खोला और सबको उतारने लगे. दो जवानों ने सबसे पहले मोहम्मद यासीन की दोनों ओर से बांहें पकड़ी, तीसरे ने उसे गोली मारी और नहर में फेंक दिया. इसी तरह मोहम्मद अशरफ को मारकर फेंक दिया.

तब तक लोगों को अंदाजा लग गया था कि पीएसी वालों का क्या इरादा है. यह देखकर सारे नौजवान गिड़गिड़ा रहे थे, जान की भीख मांग रहे थे, जबकि वे लोग गाली दे रहे थे. फिर मुझे भी गोली मारी और फेंक दिया. मुझे होश नहीं था कि मैं जिंदा हूं या मर चुका हूं. मैं बहते हुए किसी तरह नहर के किनारे पहुंचा और घास पकड़कर लटक गया. गोलियों और कराहने-चीखने की आवाजें आ रही थीं. जब ट्रक चला गया और चारों ओर सन्नाटा छा गया तो मैं बहुत देर बाद निकला. मुझे ऊपर चार लोग मिले.

वहीं, घटना में जिंदा बचने वालों में शामिल रहे मोहम्मद उस्मान ने इंडिया टुडे को बताया था- ‘जब हत्यारों ने तीन लोगों को मारकर फेंक दिया तो हमें लग गया कि वे सबको इसी तरह मारकर फेंक देंगे. सबने आपस में कानाफूसी की और कहा कि ‘अल्लाह का नाम लो और एक साथ इनके ऊपर टूट पड़ो.’ लेकिन जैसे ही खड़े हुए उन्होंने ट्रक में ही गोलियों की बरसात कर दी. एक-एक गोली कई लोगों को चीरकर निकल गई.’ उस्मान के उनकी कमर और पैर में गोली लगी थी.

गंग नहर पर मुजीबुर रहमान को भी गोली मारी गई थी जो सीना चीरकर पीछे से निकल गई. वहीं, बाबूदीन ने दो गोलियां खाने के बाद नदी में फेंके जाने पर ऐसे दम साध लिया था कि हत्यारों को लगा कि वह मर गया. उसे गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय की टीम ने निकाला था.