.तो इस वजह से गैंगरेप को अंजाम देते हैं नाबालिग

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why gangrape done

पिछले कुछ वक्त से गौर करें तो रेप जैसा घिनौना कृत्य करनेवाले भी नाबालिग और वारदात में पीड़ित भी नाबालिग ही मिलती है। उदाहरण के रूप में कानपुर जिले के महाराजपुर क्षेत्र से आया मामला, जिसमें चार साल की बच्ची के साथ गैंगरेप करने का आरोप छह से दस वर्ष तक की आयु के बच्चों पर लगा। देहरादून में भी पांच नाबालिगों ने एक आठ साल की मासूम के साथ सामूहिक रूप से दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया था। इन सबके इतर एक ऐसी भी घटना आई जिसमें पीड़ित तो बालिग थी लेकिन वारदात को अंजाम देनेवाले नाबालिग थे। नई दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके की रहनेवाली एक 21 वर्षीय युवती ने आरोप लगाया था कि पड़ोस में रहनेवाले नाबालिग ने उसे पार्टी में बुलाया और वहां पर अपने चार अन्य दोस्तों के साथ मिलकर कई घंटों तक रेप किया।

ढेरों सवाल होंगे आपके जेहन में, आप यह भी जानना चाहते होंगे कि नाबालिग इन वारदातों में कैसे शामिल हो जाते हैं, इस तरह से उनके भटकने की वजह क्या है? इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश हमने लखनऊ के जाने-माने मनोवैज्ञानिक और अखिल भारतीय अधिकार संगठन के अध्यक्ष आलोक चांटिया से की। मामला सामने आता है कि छह साल के बच्चों ने पॉर्न मूवी देखकर गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया, इन वारदातों के पीछे असल जिम्मेदार कौन हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘यह प्रमाणित हो चुका है कि पांच साल की उम्र तक बच्चा जो कुछ देख लेता है, समझ लेता है, उसी को वह पूरा जीवन करता है और मानता है। वह पांच साल तक जान लेता है कि यह मां हैं, यह पिता हैं, यह सगे भाई हैं, यह सगी बहन हैं तो उसी के मुताबिक वह वही भाव रखता है। आईपीसी की धारा 292 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि अश्लील साहित्य का न मुद्रण होगा, न प्रकाशन होगा न किसी के सामने ऐसा प्रस्तुत किया जाएगा कि उसे उकसाया जाए। हमारे यहां विज्ञापन निर्धारित होते हैं ऐडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) की अनुमति से। अब इन विज्ञापनों को छोटा-छोटा बच्चा घर पर देखता है कि स्प्रे में कोई जादू होता है कि इसको डाल लेंगे तो लड़की पागल हो जाएगी। जिसके परिणामस्वरूप इन विज्ञापनों के बारे में बच्चा कुछ जानना भी चाहे तो डांट पड़ने के डर से ऐसे व्यक्ति को तलाशते हैं कि वह उस पर दबाव डाल सकें, उनके साथ कुछ कर सकें।’

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यह तो कम उम्र की बात रही लेकिन ऐसी भी खबरें सामने आती हैं कि अन्य आयु वर्गवाले बुजुर्ग महिलाओं को शिकार बनाते हैं। उदाहरण के रूप में मेरठ के जानी थाना इलाके के रघुनाथपुर गांव में, जहां 100 वर्षीय बुजुर्ग महिला के साथ कथित तौर पर रेप किया गया। इस वारदात को अंजाम देने का आरोप लगा 35 वर्षीय अंकित नाम के शख्स पर। इसके जवाब में आलोक चांटिया ने कहा, ‘जहां नाबालिगों में उत्सुकता है वहीं मच्योर लोगों को यह पता है कि कानून इतना लचर है कि हम बहुत कुछ करके भी सजा नहीं पाएंगे, सजा पाएंगे तो साबित होने में सालों लग जाएंगे। कुछ दिनों पहले एक मामले में आदेश आया कि रेप किया है लेकिन आरोपी शादी करना चाहता है तो क्या दिक्कत है। एक और मामला सामने आया था कि ऐसिड अटैक हुआ क्योंकि युवती ने शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद आरोपी ने कह दिया कि हम शादी कर रहे हैं और लीजिए इस मामले में आदेश आया कि केस को खत्म कर दिया जाए। जब पुरुष समाज यह देख रहा कि नया ट्रेंड बन रहा है कि अपराध करो और पकड़े जाओ तो कह दो कि हम शादी कर रहे हैं। कानून कुछ ऐसा होना चाहिए कि क्राइम की सजा मिलनी ही चाहिए। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि एक तरफ ऐसिड अटैक करके शादी करने पर छोड़ा जा रहा है और दूसरी तरफ घरेलू हिंसा अधिनियम बनाकर कहा जा रहा है कि पत्नी को मारेंगे-पीटेंगे तो सजा मिलेगी।’

निर्भया की तर्ज पर कांड जारी हैं, इंडिया गेट एक अड्डा बन गया है कि रात 11 बजे पहुंचिए, मोमबत्ती जलाइए, विपक्ष के नेता आएंगे, सत्ता में मौजूद सरकार को कोसेंगे और फिर अगले दिन से सन्नाटा पसर जाता है। क्यों इस पर लोग मजबूती के साथ खड़े नजर नहीं आते, क्यों जब लड़कियों के साथ सड़क पर छेड़छाड़ होती है तो विरोध नहीं करते? इसके जवाब में मनोवैज्ञानिक आलोक चांटिया ने कहा, ‘हमारे देश में पहले प्रति 8 मिनट में एक लड़की का बलात्कार होता था और आज यह वक्त 7 मिनट हो गया है। रिफ्लेक्टिव सोसायटी में परोपकार या समाजसेवा एक नई परिभाषा बन गई है। पीड़िता को आज कोई फायदा नहीं हो रहा है, बल्कि आवाज उठाकर खुद की पहचान बनाने के साथ ही वह पुरस्कृत होने लगते हैं। समाज में वह मुखौटे ज्यादा उभरे जिन्होंने यूरोपियन कॉन्सेप्ट में खुद को समाजसेवी पाया। यूरोपियन कॉन्सेप्ट है कि ट्विटर पर लिखो, अपने बारे में कहो। बता दूं कि हिंदुस्तानी कॉन्सेप्ट में कोई नाम नहीं होता था क्योंकि यह गुप्त सेवा होती थी। यूरोपियन कॉन्सेप्ट में होता है कि लोग जानें कि यह मैंने किया। यह धीरे-धीरे संस्कृति बन गई है।’

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इस पर लगाम कसने के सवाल पर आलोक चांटिया ने कहा, ‘सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था बने कि बनाए गए कानून ठीक से लागू हों। शिकायत की जाती है तो कहा जाता है कि हमने कानून बना दिया है अब आप जाइए उसके तहत लड़िए। आज सरकार, राज्य और जनता अलग हो गए हैं, जो महिलाओं के लिए खतरनाक हैं।’

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं