Saturday, September 21, 2019
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खतना प्रथा पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा केवल शादी के लिए नहीं है महिला का जीवन

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कोर्ट ने कहा कि महिलाओं की खतना केवल इसलिए ही नहीं होना चाहिये कि उन्‍हें आगे चलकर विवाह करना है।

नई दिल्ली। दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं की खतना प्रथा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। इस प्रथा के विरुद्ध शीर्ष अदालत में दायर एक याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुसलमानों में महिलाओं का खतना करने की प्रचलित प्रथा पर सख्त टिप्पणी की है। सोमवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस प्रथा पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला से ही पति की पसंद बनने की अपेक्षा क्यों होनी चाहिए? क्या वह कोई पशु है जो किसी की पसंद या नापसंद बने? कोर्ट ने कहा कि ये मामला महिला की निजता और गरिमा से जुड़ा है। ये संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। केंद्र सरकार ने भी इस प्रथा को बंद करने की मांग का समर्थन किया। मामले पर मंगलवार को भी सुनवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें महिलाओं का खतना करने की प्रथा पर रोक की मांग की गई है। मामले पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर व डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील राकेश खन्ना ने प्रथा का विरोध करते हुए कहा कि पांच-सात साल की बच्चियों का खतना किया जाता है। यह उनके लिए बहुत ही पीड़ादायक होता है।

ये काम मिड वाइफ या अप्रशिक्षित दाइयां करती हैं। ये जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हनन है। इन दलीलों पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह केवल अनुच्छेद 21 का हनन नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 15 का भी हनन है। अपने निजी अंगों पर व्यक्ति का एकाधिकार होता है। ये व्यक्ति की निजता और गरिमा से जुड़ा मुद्दा है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह लिंग आधारित संवेदनशीलता का मुद्दा है। इसके कई अन्य पहलू भी हैं।

महिला पर पति की पसंद बनने का दबाव डालना संविधान सम्मत नहीं है। यह सेहत के लिए भी हानिकारक है। यह प्रथा अनुच्छेद 21 में दिए गए स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का हनन है। पीठ ने कहा कि संविधान हर व्यक्ति को अपने शरीर पर पूर्ण नियंत्रण देता है। महिलाओं के बारे में सोचते हुए हम उलटी दिशा में कैसे जा सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी महिला से ही ऐसी अपेक्षा क्यों की जाती है? क्या वह पशु है कि उसके साथ यह सब सिर्फ इस उद्देश्य से हो कि वह अपने पति की खुशी बने?

प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कहा गया है कि दाऊदी बोहरा मुसलमानों में लड़कियों का खतना होने के बाद ही उनकी शादी होती है। यह प्रथा महिला की पवित्रता को कायम रखने के नाम पर चल रही है। छोटी बच्चियों और कुंआरी लड़कियों के निजी अंग के एक भाग को काट दिया जाता है, जिससे उनमें यौन संबंध के प्रति उत्साह और इच्छा काबू में रहे। प्रथा के खिलाफ बहस करते हुए वकील इंद्रा जयसिंह ने कहा कि महिला के निजी अंगों को छूना, उन्हें चोट पहुंचाना आइपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म) और बाल यौन हिंसा निरोधक कानून (पोस्को) में दंडनीय अपराध है। जो चीज कानून में अपराध है, वह धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं हो सकती।

केंद्र ने प्रथा पर रोक का किया समर्थन

केंद्र सरकार की ओर से पेश अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका का समर्थन करते हुए इस प्रथा पर रोक की मांग की। उन्होंने कहा कि 42 देशों में इस पर रोक है। अटार्नी जनरल ने यह भी कहा कि पहले ही इस मामले में काफी देर हो चुकी है।