शहीद के ताबूत पर जब तुड़वाई गईं पत्नी की चूडियां तो रो पड़ा हर कोई

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शहीद की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, गांव की किसी भी गली में पैर रखने को नहीं बची जगह, 8 किमी की शौर्य यात्रा में लग गए 3 घंटे

शहीद के ताबूत पर जब तुड़वाई गईं पत्नी की चूडियां तो रो पड़ा हर कोई

झज्जर (हरियाणा). सैनिकों की नर्सरी कहे जाने वाले भदानी गांव में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर आजादी के बाद तक 105 साल में ऐसा पहला मौका रहा, जब गांव में किसी शहीद का पार्थिव शरीर पहुंचा हो। जम्मू-कश्मीर में हेलिकॉप्टर क्रैश में शहीद हुए सार्जेंट विक्रांत सहरावत को हजारों की संख्या में लोगों ने सिविल अस्पताल से भदानी गांव तक 8 किलोमीटर शौर्ययात्रा निकालकर श्रद्धांजलि दी। भदानी की सीमा तक 8 किलोमीटर का सफर तय करने में 3 घंटे लगे। मार्गों और चौराहों पर अपने लाडले को देखने और उस पर पुष्प वर्षा करने की होड़ लग गई।

दोपहर पौने बारह बजे शव यात्रा गांव के पैतृक मकान पहुंची तो यहां पिता कृष्ण सहरावत को सबसे पहले ताबूत और तिरंगा पकड़ाया गया। अपने लाल को इस तरह ताबूत में बंद देख परिजनों के सब्र का बांध टूट गया। पत्नी सुमन की लाल रंग की चुड़ियां विक्रांत के ताबूत पर तुड़वाई गईं। इस दौरान सीएम मनोहरलाल खट्टर, कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़, वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु, सांसद दीपेंद्र हुड्डा, विधायक गीता भुक्कल, रघुबीर कादियान भी मौजूद थे। कई स्कूलों-कॉलेजों के बच्चों ने भी शहीद की अंतिम यात्रा में शिरकत की।

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48 वर्ष पहले राजवीर देशवाल हुए थे शहीद
भदानी गांव सैनिकों की शहादात और देश सेवा के जज्बे के साथ सेना में भर्ती होने वाले गांव के नौजवानों के रूप में जाना जाता है। प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1918 से लेकर वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान गांव में 10 सैनिक व अफसर शहीद हुए हैं। विक्रांत इस गांव के 11वें शहीद हैं। इनमें से विक्रांत का शरीर ही शहादत के बाद गांव में आ सका। वहीं, गांव में 48 साल बाद विक्रांत के रूप में कोई सैनिक शहीद हुआ है। इससे पहले वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध में राजवीर देशवाल देश के लिए शहीद हुए थे। तब भी उनके परिवार को उनका पार्थिव शरीर नहीं मिल सका था।

शहीद के पिता सीएम से बोले
शहीद विक्रांत सहरावत के पिता कृष्ण सहरावत ने बेटे को श्रद्धांजलि देने आए सीएम मनोहरलाल से अपने परिवार के संघर्ष को भी बयां किया। कृष्ण बोले कि सीएम साहब मैंने महज सवा एकड़ जमीन बोकर अपने चार बच्चों को पाला। इनमें से एक बेटा तो आज देश के नाम कुर्बान हो गया है अब दूसरे विशांत को संभाल लो। पिता ने सीएम से गुजारिश की कि वो दूसरे बेटे को भी वायु सेना में भर्ती करा दें। इस पर सीएम व वित्त मंत्री बोले कि आपके परिवार के साथ हमेशा सरकार खड़ी है। किसी भी बात की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। इस दौरान पिता ने सीएम से कहा कि देश भर के परिवार अपने बच्चों की रोज-रोज की शहादत से दुखी हैं, क्यों न एक बार में ही पाकिस्तान को सबक सिखा दिया जाए। यह बात आप पीएम से कहो। इस पर सीएम ने कहा कि पीएम ने देश के सैनिकों को अब खुली छूट दे दी है। इसका असर देखने को मिल रहा है।

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पूर्व सैनिक बोले-पहले तो टेलीग्राम पर मिलती थी शहादत की सूचना
भदानी गांव के पूर्व सैनिक सूबेदार जगवीर ने बताया कि यह भदानी गांव में पहला मौका है जब किसी शहीद का शरीर संस्कार के लिए आया हो। इससे पहले तो किसी गांव के किसी शोकाकुल परिवार को यह मौका ही नहीं मिला। सेना में शहीद होने की सूचना परिवार को टेलीग्राम के जरिए ही मिलती थी।

इतना जनसैलाब पहली बार देखा
गांव निवासी 75 वर्षीय इंद्राज ठेकेदार ने बताया कि विक्रांत इस गांव से शहादत पाने वाले 11वां सैनिक है। इससे पहले 10 सैनिक व अफसर शहीद हुए हैं, लेकिन गांव के लोगों ने अंतिम संस्कार में इतना जनसैलाब पहली बार देखा है।

कारगिल युद्ध के बाद बदला माहौल
सेना से ही रिटायर्ड गांव निवासी सुरेंद्र सहरावत ने बताया कि आज भदानी गांव में देशभक्ति का जो सैलाब देखने को मिला, उसका कारण कारगिल युद्ध के बाद बदला माहौल है। उस युद्ध के दौरान ही शहीद हुए सैनिक या अफसर का पार्थिव शरीर उसके घर सम्मान के साथ भिजवाने की परंपरा शुरू हुई।

देश पर दो बच्चों के जिम्मेदारी छोड़ गया विक्रांत
शहीद विक्रांत के परिवार में माता-पिता के साथ धर्मपत्नी सुमन, डेढ़ वर्ष का बेटा वरदान, साढ़े 5 वर्ष की बेटी काव्या, बहन शर्मिला व सुनैना तथा भाई विशांत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा सरकार शहीद के परिवार के साथ खड़ी है।

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पहली बार श्मशान घाट में आकर लाल को किया विदा
भदानी गांव में ऐसा पहला मौका रहा जब गांव की महिलाएं श्मशान स्थल पर आई हों। भारी संख्या में महिलाओं ने श्मशान तक पहुंचकर शहीद विक्रांत को श्रद्धांजलि दी। विक्रांत के पार्थिव शरीर को जब अग्नि के हवाले किया जा रहा था तब महिलाओं ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के भी नारे लगाए और भारतीय सैनिकों की वीरता को सलाम किया। गांव निवासी कृष्णा, ज्योति, संगीता, रेखा, नरेश देवी, सुशीला ने कहा कि गांव की परंपरा रही है कि कभी भी कोई महिला संस्कार स्थल पर नहीं आई, लेकिन आज समय बदला हुआ है।

दोस्त बोले- हम सबका सिर गर्व से ऊंचा किया
विक्रांत को अंतिम विदाई देने वाले उनके स्कूल व कॉलेज के दोस्त भी गांव आए। विक्रांत की प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने झज्जर के बीकानेर चौक स्थित राजकीय सीनियर सेकंडरी स्कूल में 12 वीं कक्षा तक पढ़ाई की। वहीं राजकीय नेहरू कॉलेज से स्नातक की। विक्रांत के साथ माडॅल स्कूल में कक्षा 6 से 10 वीं तक पढ़ाई करने वाले झज्जर सैनिक रेस्ट हाउस के पास रहने वाले डॉ. संदीप सैनी ने बताया कि विक्रांत क्रिकेट खेलने का बहुत शौकीन था। स्कूल में जब भी हमें समय मिलता था तब क्रिकेट खेलते। इसके अलावा विक्रांत एथलीट में भी काफी अच्छा था। उनकी मित्र मंडली में विक्रांत के अलावा भदानी के ही राहुल सहरावत, नीरज कोडान, कुलदीप देशवाल सेना में भर्ती हुए। देश सेवा करते हुए पहले हमारे दोस्त नीरज कोडान देश के लिए शहीद हुआ तो अब विक्रांत ने हम सबका सिर गर्व से ऊंचा किया।

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