मौत से कई बार ठनी, पर आज जंग हार गए अटल

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नई दिल्ली भारतीय राजनीति के अटल अध्याय का अंत हो चुका है। अपने ओजस्वी भाषण के लिए हमेशा याद रखे जानेवाले अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार को निधन हो गया। वाजपेयी कई वर्षों से बीमार थे और 11 जून को तबीयत ज्यादा गड़बड़ होने के बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। वाजपेयी ने अपने जीवन काल में कई कविताएं लिखीं लेकिन कलम और वाणी के धनी इस राजनेता की एक कविता सीधे काल से होड़ लेने की थी। उस कविता की पंक्तियां थीं, ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं।’

अटल ने केवल यह कविता लिखी ही नहीं बल्कि उनके जीवन में ऐसे मौके आए जब उन्होंने काल से होड़ भी ली। 1990 के दशक में किडनी का इलाज हो या 2005 में तबीयत बिगड़ने की खबरें यहां तक कि 2009 का वह आघात जिसके बाद अटल कभी ओजस्वी भाषण नहीं दे पाए, हर बार भारतीय राजनीति के लाल ने काल को पछाड़ा। इस बार भी देश को उम्मीद थी कि अटल जीवन युद्ध को जीत वापस लौटेंगे, लेकिन पूर्व पीएम इस बार काल के कपाल पर लिखा मिटा नहीं पाए।

आपको बता दें कि 1988 में वाजपेयी को किडनी संबंधित समस्या हुई थी। उस समय वह इलाज कराने के लिए अमेरिका गए थे। तब मशहूर लेखक धर्मवीर भारती को लिखे एक खत में उन्होंने मौत को हराने के जज्बे पर एक कविता लिखी थी। इस कविता की पंक्तियां थीं, ‘ठन गई! मौत से ठन गई!’ तब अटल ने काल के भंवर जाल के बीच डगमगाती अपने जीवन की कश्ती को इस कविता में दिख रहे हौसले की तरह बचाया था।

फिर आया साल 2009, जब अटल को स्ट्रोक आया। अटल ने एक बार फिर काल को पराजित किया। हालांकि इस बार उन्हें जीवन या ओजस्वी वाणी में से एक के चुनाव के लिए जरूर मजबूर होना पड़ा, लेकिन उनके भीतर का कवि काल से होड़ लेता रहा। अटल ने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में कभी कहा भी था कि कविता ही उन्हें राजनीतिक दुश्वारियों से निपटने का संबल देती है।

शायद वह कविता ही थी जिसने स्वास्थ्य से जुड़ी दुश्वारियों के बीच भी अटल को थामे रखा। स्ट्रोक के साथ डिमेंशिया की समस्या हो या लगातार छोटी-मोटी बीमारियों का हमला, अटल अपने डॉक्टरों के साथ लगे रहे। बीमार होने के बाद उनके ठीक होने की खबरें आती रहीं। 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होते हुए वाजपेयी की एक तस्वीर सामने आई। देश में अपने चिरयुवा नेता को पहली बार कमजोर देखा।

फिर तस्वीरें तो नहीं आईं लेकिन उनकी तबीयत का हाल-समाचार देश को पता चलता रहा। खबरें आती रहीं कि अटल डिमेंशिया से पीड़ित होकर काफी कुछ भूल जाते हैं लेकिन कभी-कभी टीवी पर अच्छी खबरें चलती हैं तो मुस्कुराते हैं। बीमारी से जूझने के इन दिनों में आडवाणी और राजनाथ अक्सर अपनी पार्टी के इस ‘भीष्म’ से मिलने जाते रहे, जिसने लंबे समय तक पितामह की भूमिका अदा की लेकिन एक दिन तय होता है। एक मनहूस खबर आनी होती है और वह आई। अपने साथ भारतीय राजनीति का अटल अध्याय समाप्त कर गई।

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